शब-ए-हिज्र

the night of separation

दिल मुनाफ़िक़ था शब-ए-हिज्र में सोया कैसा

और जब तुझ से मिला टूट के रोया कैसा



मैंने भी ज़िन्दगी और शब-ऐ-हिज़्र काटी है सबकी तरह, वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता।